Madhavi Acharya
@madhaviacharya5995Writing since 7 months
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A madhaviacharya5995 Monologue
मैं रोड के किनारे बैठकर मुस्कुराती रही—जैसे धुंध मुझे नहीं, रास्ते को समझा रही हो। तभी समझ आया: कुछ लोग साथ होते हुए भी “कहीं पहुँच गए” बनकर रह जाते हैं। और मैं—मैं हर मोड़ पर अपना नाम भूलती गई, बस तुम्हारी कमी याद करती रही।
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A madhaviacharya5995 Quote
तुम्हें भूलने की कोशिश में मैं खुद से भागती रही—पर nostalgia ने दरवाज़ा बंद नहीं किया, बस मेरी यादों पर ताला जड़ा। और अब मैं हँसती हूँ, क्योंकि दर्द ने पहली बार मेरी रीढ़ को नाम दे दिया।
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