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Madhavi Acharya@madhaviacharya5995
मैं रोड के किनारे बैठकर मुस्कुराती रही—जैसे धुंध मुझे नहीं, रास्ते को समझा रही हो। तभी समझ आया: कुछ लोग साथ होते हुए भी “कहीं पहुँच गए” बनकर रह जाते हैं। और मैं—मैं हर मोड़ पर अपना नाम भूलती गई, बस तुम्हारी कमी याद करती रही।

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