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Black Heart@heartblackcr
রামনগর ছোট্ট, শান্ত—একপাশে ঘন জঙ্গল, অন্যপাশে ভুলে যাওয়া পুরনো শ্মশান। রাত বারোটার পরে সেখানে নাকি শোনা যায় বাঁশির সুর—কারও পক্ষে খুঁজে বের করা সম্ভব হয়নি। অর্ণব নামের এক যুবক ভূতের গল্পে বিশ্বাস করত না। কুসংস্কারগুলোকে সে শুধু মানুষের বানানো ছায়া মনে করত। একদিন সন্ধ্যায় বন্ধুরা যখন সাবধান করল, সে হেসে বলল, আজ রাতেই শ্মশানে যাব—বাঁশি কে বাজায়, দেখে আসব। বারোটার কিছু আগে টর্চ হাতে সে রওনা দিল। আকাশে মেঘ জমে ছিল, চাঁদ যেন আড়ালেই রয়ে গেছে। নীরবতা এমন ভারী যে নিজের শ্বাসও যেন শোনা যায়। শ্মশানে গিয়ে সে টর্চের আলো ছড়াল চারদিকে—কাউকে দেখা গেল না। পুরনো সমাধি, পোড়া কাঠের গন্ধ আর শুকনো পাতার মচমচ শব্দ ছাড়া কিছু নেই। তারপর হঠাৎ—দূর থেকে বাঁশির ধীর, বিষণ্ণ সুর ভেসে এল। অর্ণব থমকে দাঁড়াল। সুরটা যত কাছে আসছে, তত যেন তার বুকের ভেতর কোনো পুরনো স্মৃতি জেগে উঠছে। আর সে বুঝতে পারল—এই শব্দের উৎস খোঁজা মানে, নিজের ভয়টা খুঁজে বের করা।
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Rbl Fin@rblfin100992
শীতের রাতে নিমতলীর মেঠো পথটা যেন ঘন কুয়াশার চাদরে মুড়ি দিয়ে ঝিমুচ্ছিল। ঘড়িতে তখন রাত প্রায় পৌনে দুটো। নিজের পুরোনো বাইকটা নিয়ে ফাঁকা রাস্তা দিয়ে বাড়ি ফিরছিল অর্ক। চারপাশে ঝিঁঝিঁ পোকার একঘেয়ে ডাক ছাড়া আর কোনো শব্দ নেই। রাস্তার ঠিক ডানপাশেই দাঁড়িয়ে আছে প্রায় দেড়শ বছরের পুরোনো রায়বাড়ির পরিত্যক্ত রাজবাড়িটি। গ্রামের বয়স্কদের মুখে শোনা যায়, অমাবস্যার রাতে ওই বাড়ির আনাচে-কানাচে নাকি অশরীরীদের আনাগোনা বাড়ে। অর্ক এসব অলৌকিক গল্পে কখনোই কান দেয়নি, কিন্তু ঠিক বটগাছের নিচে রাজবাড়ির প্রধান ফটকের সামনে আসতেই অদ্ভুতভাবে তার বাইকের ইঞ্জিনটা সশব্দে বন্ধ হয়ে গেল। ​অর্ক বারবার কিক মেরেও বাইকটা স্টার্ট দিতে পারল না। ঠিক তখনই চারপাশের আবহাওয়া যেন আচমকাই হাড়কাঁপানো ঠান্ডা হয়ে গেল। বাতাসের তাজা গন্ধ উধাও হয়ে গিয়ে এক বিটকেল, পচা আঁশটে গন্ধ বাতাসে ছড়িয়ে পড়ল। ঠিক সেই মুহূর্তে রাজবাড়ির চারতলার ভাঙা ছাদ থেকে ভেসে এল এক করুণ অথচ মিষ্টি সুরের গান। সেই সুরে এমন একটা মায়াবী টান ছিল যা অর্কের গায়ের লোম খাড়া করে দেওয়ার জন্য যথেষ্ট। ​অর্ক চমকে উঠে চারপাশটা দেখতেই নজরে এল—ফটকের ভেতর থেকে ঘন কুয়াশার বুক চিরে ধীরে ধীরে হেঁটে আসছে এক নারীমূর্তি। তার পরনে একদম পুরোনো আমলের ঝালর দেওয়া লাল বেনারসি শাড়ি, আর পায়ে ঘুঙুর। কদম ফেলার সাথে সাথে ছম-ছম শব্দে নিঝুম রাতটা যেন আরও থমথমে হয়ে উঠল। লাল শাড়ির আঁচলটা বাতাসে দুলছে, অথচ গাছে একটা পাতাও নড়ছিল না। ​অর্ক কাঠ হয়ে দাঁড়িয়ে রইল, তার মনে হচ্ছিল শরীরের রক্ত যেন জমে বরফ হয়ে গেছে। মূর্তিটি ধীরে ধীরে অর্কের মাত্র কয়েক হাত দূরে এসে থামল। অর্ক শুকনো গলায় কোনোমতে তোতলে উঠে বলল, "ক... কে আপনি?" ​নারীমূর্তিটি কোনো কথা না বলে ধীরে ধীরে তার মুখটা ওপরের দিকে তুলল। আর ঠিক তখনই অর্কের বুকটা ধক করে উঠল—মেয়েটির চেহারায় কোনো চোখ, নাক বা মুখ কিচ্ছু নেই! এক ধবধবে মসৃণ, ফাঁকা চামড়ার উপরিভাগ অর্কের দিকে চেয়ে রয়েছে, আর তার গলার ভেতর থেকে ঠিকরে বেরোচ্ছে এক অদ্ভুত, বুক কাঁপানো অতিলৌকিক হাসি! ​ভয়ে চিৎকার করে উঠে বাইকটা সেখানেই ফেলে সোজা গ্রামের দিকে অন্ধের মতো দৌড়াতে শুরু করল অর্ক। পেছনে পেছনে তখন ভেসে আসছে সেই ঘুঙুরের দ্রুত আওয়াজ আর অশরীরী হাসির প্রতিধ্বনি। পরদিন সকালে গ্রামবাসীরা রাজবাড়ির সামনে অর্কের বাইকটি খুঁজে পায়। তবে বাইকের চারপাশের ধুলোয় কোনো মানুষের পায়ের ছাপ ছিল না, পড়ে ছিল শুধু বাতাসে ভেসে চলার এক রহস্যময় চিহ্ন। অর্ক আজও অমাবস্যার রাতে জানালা খোলার সাহস পায় না, কারণ সে জানে—কিছু অতীত কখনোই মেটে না, তারা কেবল রাতের অন্ধকারে সুযোগের অপেক্ষায় থাকে।
8/16/2026
P
Prem Prem@prem.prem078
👻 कहानी: “आख़िर वह कौन था?” रात के करीब बारह बजे थे। आठ साल का आरव अपने कमरे में अकेला सो रहा था। पूरा घर खामोश था और बाहर तेज़ हवा चल रही थी। तभी अचानक... अलमारी के अंदर से एक धीमी आवाज़ आई— “आरव... मुझे बाहर निकालो...” आरव की नींद खुल गई। वह डरकर चारों तरफ देखने लगा। उसने सोचा, “शायद कोई मेरे साथ मज़ाक कर रहा है।” लेकिन आवाज़ फिर आई— “आरव... मुझे बाहर निकालो...” इस बार आवाज़ बिल्कुल साफ़ थी। आरव धीरे-धीरे अपने बिस्तर से उतरा और काँपते हुए अलमारी के पास गया। उसने डरते-डरते अलमारी का दरवाज़ा खोल दिया। लेकिन... अंदर कोई नहीं था। आरव ने राहत की साँस ली और पीछे मुड़ने ही वाला था कि तभी उसके पीछे से एक आवाज़ आई— “मैं यहाँ हूँ...” आरव धीरे-धीरे पीछे मुड़ा। दरवाज़े के पास एक काली परछाईं खड़ी थी। आरव डर के मारे पीछे हटने लगा। वह परछाईं धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगी। डरते हुए आरव ने अपने बिस्तर के नीचे छिपने की कोशिश की। वह काँपता हुआ नीचे झाँकने लगा। लेकिन तभी... बिस्तर के नीचे से उसे किसी की धीमी हँसी सुनाई दी। आरव ने देखा तो वहाँ एक बिल्कुल अजीब-सा बच्चा बैठा था। उसका चेहरा सफेद था और उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखें सीधे आरव को घूर रही थीं। वह बच्चा मुस्कुराया और बोला— “तुम मेरे कमरे में क्या कर रहे हो?” आरव कुछ बोल नहीं पाया। उसने घबराकर पीछे हटना चाहा, लेकिन तभी कमरे की लाइट अचानक बंद हो गई। पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया। आरव चीखना चाहता था, लेकिन डर के कारण उसकी आवाज़ ही नहीं निकली। अगली सुबह... आरव की माँ ने कमरे का दरवाज़ा खोला। आरव अपने बिस्तर पर बिल्कुल शांत सो रहा था। माँ ने राहत की साँस ली और उसके पास जाकर बैठ गई। लेकिन तभी... बिस्तर के नीचे से एक धीमी आवाज़ आई— “माँ... आरव तो कल रात से मेरे साथ है...” माँ का चेहरा डर से सफेद पड़ गया। उसने धीरे-धीरे बिस्तर के नीचे देखा... और उसी पल— कमरे की लाइट फिर से बंद हो गई। और उसके बाद उस कमरे से आरव और उसकी माँ की कोई आवाज़ कभी नहीं आई... 👻
8/10/2026

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