A
Archana Patel@archanapatel9021
भिनसार वाली साँझ में मैं संगीन रास्ता खोजैत रहली—हृदय नहिं, कन्ध पर डर लादि। जेना-जना दौड़ै छी, तैना-तैना तखनाल तोर हाथ भेटैत अछि; ने बुझाइ, ने बचाइ—बस ठहका देत अछि। और अन्त में बुझलिअ: साहस ई नहिं जे लड़ैत छी, साहस ई जे रुकि के तोर घाबराहटके देखैत छी—आ हमरा भीतर बड़का लहर बनि जाइत अछि।

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