Noor Mansuri
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A noormnsr1103 Short Story
जंगल का खज़ाना और समझदार मोनू एक सुंदर गाँव के किनारे एक घना जंगल था। उस गाँव में आरव नाम का एक समझदार और दयालु लड़का रहता था। आरव की सबसे पक्की दोस्ती मोनू नाम के एक शरारती लेकिन चतुर बंदर से थी। मोनू हमेशा आरव के कंधे पर बैठा रहता, और दोनों मिलकर पूरा दिन नई-नई तरकीबें खोजते थे। एक दिन, आरव और मोनू जंगल में टहल रहे थे। चलते-चलते आरव की नज़र एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे दबे एक चमकीले डिब्बे पर पड़ी। आरव ने उत्सुकता से डिब्बा खोला। उसमें सोने-चांदी के सिक्के नहीं, बल्कि एक सुंदर काँच का चिराग और एक पुराना नक्शा था। लालच का जाल आरव ने जैसे ही चिराग को छुआ, नक्शे पर कुछ शब्द चमकने लगे: "जो इस चिराग को रगड़ेगा, उसे दुनिया का सबसे मीठा और कभी न खत्म होने वाला फल मिलेगा, लेकिन बदले में उसे अपनी सबसे प्यारी चीज़ गँवानी होगी।" आरव का मन ललचा गया। उसने सोचा, "अगर मुझे वह फल मिल जाए, तो मुझे कभी भूख नहीं लगेगी और मैं उसे सबको बाँट सकूँगा!" आरव चिराग को रगड़ने ही वाला था कि मोनू ने झट से आरव का हाथ पकड़ लिया। मोनू की समझदारी मोनू ने जोर-जोर से खीं-खीं करते हुए अपनी गर्दन हिलाई और आरव के हाथ से चिराग छीनकर दूर रख दिया। मोनू ने इशारों में आरव को समझाया कि बिना मेहनत के मिलने वाली चीज़ हमेशा कोई न कोई बड़ी कीमत माँगती है। अगर उसने अपनी सबसे प्यारी चीज़ (जो कि उनकी दोस्ती थी) खो दी, तो उस फल का क्या फायदा? आरव को तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने मोनू को गले लगा लिया और कहा, "तुम सही कह रहे हो, मोनू! लालच में आकर मैं अपनी सबसे अनमोल चीज़—तुम्हारी दोस्ती—खो देता।" सच्चा खज़ाना आरव ने उस चिराग को वापस मिट्टी में गाड़ दिया और नक्शा वहीं छोड़ दिया। दोनों खुशी-खुशी अपने गाँव की तरफ लौट चले। रास्ते में उन्होंने एक आम के पेड़ से रसीले आम तोड़े और आधा-आधा बाँटकर खाया। उस दिन आरव ने जाना कि असली खुशी और खज़ाना किसी जादुई चिराग में नहीं, बल्कि सच्चे दोस्तों के साथ मिलकर मेहनत से मिली चीज़ों का आनंद लेने में है। कहानी की सीख: लालच हमेशा नुकसान पहुँचाता है। सच्ची दोस्ती और मेहनत से मिली खुशी ही दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना है। Is kahani ka complete prompt do
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A noormnsr1103 Short Story
जंगल का खज़ाना और समझदार मोनू एक सुंदर गाँव के किनारे एक घना जंगल था। उस गाँव में आरव नाम का एक समझदार और दयालु लड़का रहता था। आरव की सबसे पक्की दोस्ती मोनू नाम के एक शरारती लेकिन चतुर बंदर से थी। मोनू हमेशा आरव के कंधे पर बैठा रहता, और दोनों मिलकर पूरा दिन नई-नई तरकीबें खोजते थे। एक दिन, आरव और मोनू जंगल में टहल रहे थे। चलते-चलते आरव की नज़र एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे दबे एक चमकीले डिब्बे पर पड़ी। आरव ने उत्सुकता से डिब्बा खोला। उसमें सोने-चांदी के सिक्के नहीं, बल्कि एक सुंदर काँच का चिराग और एक पुराना नक्शा था। लालच का जाल आरव ने जैसे ही चिराग को छुआ, नक्शे पर कुछ शब्द चमकने लगे: "जो इस चिराग को रगड़ेगा, उसे दुनिया का सबसे मीठा और कभी न खत्म होने वाला फल मिलेगा, लेकिन बदले में उसे अपनी सबसे प्यारी चीज़ गँवानी होगी।" आरव का मन ललचा गया। उसने सोचा, "अगर मुझे वह फल मिल जाए, तो मुझे कभी भूख नहीं लगेगी और मैं उसे सबको बाँट सकूँगा!" आरव चिराग को रगड़ने ही वाला था कि मोनू ने झट से आरव का हाथ पकड़ लिया। मोनू की समझदारी मोनू ने जोर-जोर से खीं-खीं करते हुए अपनी गर्दन हिलाई और आरव के हाथ से चिराग छीनकर दूर रख दिया। मोनू ने इशारों में आरव को समझाया कि बिना मेहनत के मिलने वाली चीज़ हमेशा कोई न कोई बड़ी कीमत माँगती है। अगर उसने अपनी सबसे प्यारी चीज़ (जो कि उनकी दोस्ती थी) खो दी, तो उस फल का क्या फायदा? आरव को तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने मोनू को गले लगा लिया और कहा, "तुम सही कह रहे हो, मोनू! लालच में आकर मैं अपनी सबसे अनमोल चीज़—तुम्हारी दोस्ती—खो देता।" सच्चा खज़ाना आरव ने उस चिराग को वापस मिट्टी में गाड़ दिया और नक्शा वहीं छोड़ दिया। दोनों खुशी-खुशी अपने गाँव की तरफ लौट चले। रास्ते में उन्होंने एक आम के पेड़ से रसीले आम तोड़े और आधा-आधा बाँटकर खाया। उस दिन आरव ने जाना कि असली खुशी और खज़ाना किसी जादुई चिराग में नहीं, बल्कि सच्चे दोस्तों के साथ मिलकर मेहनत से मिली चीज़ों का आनंद लेने में है। कहानी की सीख: लालच हमेशा नुकसान पहुँचाता है। सच्ची दोस्ती और मेहनत से मिली खुशी ही दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना है। Is kahani ka complete prompt do
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A noormnsr1103 Quote
Sahih al-Bukhari 1 Narrated 'Umar bin Al-Khattab: I heard Allah's Messenger (ﷺ) saying, "The reward of deeds depends upon the intentions and every person will get the reward according to what he has intended. So whoever emigrated for worldly benefits or for a woman to marry, his emigration was for what he emigrated for." حَدَّثَنَا الْحُمَيْدِيُّ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الزُّبَيْرِ، قَالَ حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، قَالَ حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الأَنْصَارِيُّ، قَالَ أَخْبَرَنِي مُحَمَّدُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ التَّيْمِيُّ، أَنَّهُ سَمِعَ عَلْقَمَةَ بْنَ وَقَّاصٍ اللَّيْثِيَّ، يَقُولُ سَمِعْتُ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ ـ رضى الله عنه ـ عَلَى الْمِنْبَرِ قَالَ سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ " إِنَّمَا الأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ، وَإِنَّمَا لِكُلِّ امْرِئٍ مَا نَوَى، فَمَنْ كَانَتْ هِجْرَتُهُ إِلَى دُنْيَا يُصِيبُهَا أَوْ إِلَى امْرَأَةٍ يَنْكِحُهَا فَهِجْرَتُهُ إِلَى مَا هَاجَرَ إِلَيْهِ ".
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