Krishnapalsinh Zala
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A krishna06706 Short Story
रात के 2 बज रहे थे। आरव एकदम अकेला, मोबाइल की स्क्रीन की रोशनी में डूबा था। बाहर बारिश ऐसी कि हर चमक के साथ छत काँपती लगी… और बिजली—जैसे डर को गिनती हो। तभी अनजान नंबर से पहला मैसेज टपका: “खिड़की मत खोलना।” आरव हँसा—“मज़ाक है।” उसने इग्नोर कर दिया। कुछ देर बाद दूसरा मैसेज: “मैं तुम्हारे घर के बाहर खड़ा हूँ।” अब हँसी गले में अटक गई। अँधेरे में कुछ नहीं दिखता था, फिर भी उसे लगा कोई है—एकदम पास। तीसरा मैसेज आया, और शब्दों ने धड़कन तोड़ दी: “मैं बाहर नहीं… तुम्हारे घर के अंदर हूँ।” आरव ने फौरन पूरे घर की लाइटें जला दीं। हर कोना उजला—फिर भी हवा ठंडी। ऊपर से… ठक… ठक… ठक… सीढ़ियों के ऊपर कदमों की लय। घर में उसके अलावा कोई नहीं था। वह धीरे-धीरे चढ़ा। आवाज़ अचानक… बंद। और फिर उसने दरवाज़ा देखा—एक कमरा, जो सालों से बंद था… अभी खुला था। मानो किसी ने रात को “स्वागत” पहले ही भेज दिया हो।
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A krishna06706 Quote
मैं भीड़ में नहीं, मैं वो मोड़ हूँ, जहाँ से रास्ते नज़र बदल के गुजरते हैं। आज नाम छोटा है, पर हक़ीक़त लंबी है, एक दिन यही नाम पहचान बनकर बोलता है।
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