जब मुझे अस्वीकार किया गया, मेरी हँसी उड़ाई गई,
मेरे शुभ संकल्पों पर भी ऊंगली उठाई गई।
मैं मौन रहा, बस मन में ठान लिया,
जवाब शब्दों से नहीं दिया और कर्मों का संज्ञान लिया।
किया नहीं कभी किसी का विरोध है।
क्योंकि सफलता ही सर्वोत्तम प्रतिशोध है।
न तिरस्कार की अग्नि में मैं जला,
ना ही प्रतिहिंसा के पथ पर मैं चला।
निरर्थक वाद-विवाद से दूरी बनाई,
दूसरों की भूलों से शिक्षा पाई।
मुस्कुराने का प्रयास किया,
किसी पर भी किया नहीं कभी क्रोध है,
क्योंकि सफलता ही सर्वोत्तम प्रतिशोध है।
जहाँ लोग चाह रहे थे मुझे गिरते देखना,
वहीं मैंने सीखा स्वयं को सँभालते रहना।
अब जब सफलता ने द्वार खटखटाए,
वे सब चेहरे स्वयं को छिपाते नज़र आए।
मेरे विरोधियों को भी सत्य पथ दिखा,
विश्वास कीजिए इस बात का अत्यधिक प्रमोद है।
क्योंकि सफलता ही सर्वोत्तम प्रतिशोध है।
ना कोई ताना, ना कोई अहंकार हो,
मेरा यह सपना, उज्ज्वल साकार हो।
’सुशील’ सभ्य, सुशिक्षित, सदाचारी बने सब,
हर क्षण जग में अच्छा व्यवहार हो।
इस बात पर अब ना कोई अंतर्विरोध है,
क्योंकि...Sponsored
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