B
Balaram Jain@balaramjain1889
पुरान गलीक पथरे पर हमर सपनाइ चलैत छल—जखन बुटखाना पर धूलि जमा होइत छल, आ आंखि में घरक गंध। अब शहर त खतम नइ—बस हमर आवाज़क ओ कोना बदलि गेल, आ स्मृति चुपचाप खींचैत चलि गेल…

Related

View all

Comments

No comments yet.