Videsh Se Khaali Haath Ghar
hiEnded

Videsh Se Khaali Haath Ghar

The Premise

Rohan London se laut aaya, degree adhoori aur jeb khaali, station par koi lene nahi aaya tha. Ghar ki chaukhat par pahunchte hi usne suna maa ke rone ki awaaz aur papa ki dhamki bhari baat.

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Community POVs

Rohan Sharma

  • Rohan london me study pura karne ke liye gaya tha, taki wo ek achhi digri lekar, apna cariar agge badha paye our safal ban paye,(magar) aage ushke sath kya hone wala hai, usne kabhi soncha bhi nahi tha, kyon ki rohan me kuchh badlab aa gaya tha uske habits bigar chuke the our wo nashe karna pub jana uski jindagi aiyasi me kat rahi thi eske family ko lag raha tha,ki unka ladka to london me padhai kar raha hai, lekin yahan rohan jhuthi result dikha kar apne logo ko thagta raha usaki jindagi me achanak eshi mode ayi rohan ke gharse call ayya rohan tum kaha ho tumhari mummy ki tabiyat bahot kharab hai,tum jaldi ghar ajao, ab rohan ka dimaag pura blank ho gaya,wo khali hath ghar kese jata rohan khudpar bahot pachtaba karne laga kish muh se wo ghar jata nato uske pass digari thi our na naokri, lekin bat maa ki thi wo apne ghar gaya, usne dekha ki usaki ma bed pe leti thi wo apne maa our family ballo se mile or tavi usaki ma ushse puchhti hai ki beta tum apna batao tumhe dgree to mil gayi na hame tum pe garb hai, sabhi khus the,our rohan bahot dukhi kyon use ehsash horaha tha wo hamesha apne family ko jhut bolta raha our usne socha ki wo sari sachai apne mase bata dega tabhi rohan apne mase sabhi sachai batata hai, achanak ghar ka mahol sant hojata hai magar uska family gussa nahi hote balki usako apni jiban shudharne ke liye motivat kiye our saport kiya,3 sall bad rohan ka khud ka ek company hogya rohan puri tarah se sudhar gaya apne sari gande habits ko quite karke ek bare compony ka malik bankar safal byakti bana.

    @mj369om

  • Duniya ko jhuthe log hi pasand aate hain thodi si sachhai kah dene se aajkal apne hi ruth jate hain. Beleive yourself Don't worry life is long try again and do your work everywhere avoid condemn because world is geography Parvaton par wahi chadhte hain jo phisalane ke bad bhi sahas nahi chodte unka self confidence have achieves positivity to capture on mountain pick where their roots more obstackles but they have high courageous. ye choti si line hame aur aapko yahi sikhati hai ki jindagi mein har nahi manani hai, chahe duniya mein jis bhi tarike ka kam ho. rahi bat rohan ji to mai to yahi kahunga ki rona dhona chod de. jindagi mein syahi and sahi raste ko elect kar gantavya sthan par pahunch ki surity probable hoti hai. kyonki karma ka niyam yah hai ki "Beasar hai lathi uski uske mar se koi nahi bachta" in other words can says that "mean to meanwhile" mode ka to khair bat hi stastical hai. means sadhak ko sadhna chahiye hum to thahre digital syahi wale aur aap ke sath medeation karke self contenment ho liye.

    @vijendra_vg12

  • रेलवे स्टेशन की इस भयंकर ठंड में हवाएँ ऐसे चल रही थीं जैसे किसी के सीने पर आरी चल रही हो। प्लेटफॉर्म की उस गंदी और धुंधली बेंच पर जब ट्रेन रुकी, तो मैं सबसे आखिरी डिब्बे से उतरा। मेरे बदन पर लंदन के नाम पर खरीदा गया वो कोट था, जिसके बटन कब के टूट चुके थे, और जेब में सिर्फ कुछ फटे-पुराने कागज़ात थे। कोई ढोल-नगाड़े नहीं, कोई फूल-माला नहीं, और ना ही वो माँ का आंचल जो मुझे सीने से लगा सके। स्टेशन पर मेरे अपने भाई-बंदूक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे थे, क्योंकि उनकी नज़रों में तो उनका बेटा अभी भी आसमान की ऊँचाइयों को छू रहा था। ​मेरे हाथ में मेरा सूटकेस था, जो भारी लग रहा था पर असल में उसके अंदर सिर्फ झूठी डिग्रियाँ, फर्जी मार्कशीट और उन अखबारों के टुकड़े थे जिनमें मैंने लंदन की बड़ी-बड़ी इमारतों की तस्वीरें लपेट रखी थीं। पिछले तीन सालों का सच सिर्फ मुझे पता था—कैसे हीथ्रो एयरपोर्ट की उस ठंडी रात के बाद से मेरी जिंदगी एक कभी न खत्म होने वाला nightmare बन गई थी। जब यूनिवर्सिटी की फीस भरने के पैसे नहीं बचे, तो एक छोटी सी गंदी सी बेसमेंट बेकरी में बर्तन मांजने से लेकर, रात के वक्त बर्फबारी में डिलीवरी बॉय का काम करने तक, मैंने वो हर जिल्लत उठाई थी जो एक बाप अपने बेटे को विदेश भेजते वक्त सपने में भी नहीं सोचता। लेकिन घर वालों को तो मैं यही भेजता रहा— "माँ, फिकर मत करो, तुम्हारा बेटा अब लाट साहब बन गया है, बड़ी कंपनी में मैनेजर हूँ।" ​घर तक जाने के लिए ऑटो का किराया तक मेरी जेब में नहीं था। मैंने पैदल ही अपने मोहल्ले की तरफ कदम बढ़ाए। हर एक कदम के साथ ऐसा लग रहा था मानो मेरे पैरों में कोई लोहे की बेड़ियाँ बंध गई हों। वो मोहल्ला, जहाँ कल तक लोग मेरी सफलता की मिसालें देते थे, आज मुझे अपनी तरफ घूरता हुआ महसूस हो रहा था। मैंने अपना फोन निकाला, स्क्रीन पर वही तस्वीर चमक रही थी जो मैंने एयरपोर्ट के बाहर किसी अमीर की गाड़ी के साथ एडिट करके भेजी थी। उस फोटो के नीचे लिखा कैप्शन आज मेरे मुँह पर तमाचा मार रहा था। ​आखिरकार, मैं अपने घर की उस पुरानी और जर्जर चौखट पर पहुँच ही गया। उस चौखट पर, जिसके पत्थर पर कभी मेरे बचपन के निशान हुआ करते थे। अंदर कदम रखने की हिम्मत नहीं हो रही थी, तभी अंदर से जो आवाज़ें मेरे कानों में पड़ीं, उन्होंने मेरे पैरों तले ज़मीन खिसका दी और सांसें थम गईं। ​वह मेरी माँ—सुनीता शर्मा की रोने की सिसकियाँ थीं। वही माँ, जिन्होंने अपने सुहाग की इकलौती निशानी—अपने वो पुराने सोने के कंगन और गहने, जिन्हें उन्होंने जीवनभर संभाल कर रखा था—चुपचाप एक सुनार के पास गिरवी रख दिए थे ताकि उनका बेटा विदेश जाकर नाम कमा सके। आज उनकी वो सिसकियाँ सीधे मेरी रूह को चीर रही थीं। और उनके ठीक बगल में मेरे पिता—राजेश शर्मा की कड़क, भारी और गुस्से से काँपती हुई आवाज़ गूँज रही थी। ​पापा गुस्से में दहाड़ रहे थे— "कहा था ना उस नालायक से कि अगर इस बार डिग्री और पैसे लेकर नहीं लौटा, तो इस घर के दरवाजे उसके लिए हमेशा के लिए बंद हैं! रिश्तेदारों से उधार लेकर बैंक का कर्ज़ चुकाया है, समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा इस औलाद ने मेरी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं!" ​पापा की वो धमकी भरी बात मेरे कान के परदे फाड़ रही थी। तभी अंदर से एक और कमज़ोर आवाज़ उभरी—वह मेरी छोटी बहन अंजलि की थी, जो सिसक-सिसक कर रो रही थी। अंजलि की वो शादी, जो सिर्फ मेरी इस 'झूठी सफलता' और लंदन की नौकरी के भरोसे पक्की हुई थी, आज खतरे में थी। मेरे एक झूठ ने मेरी बहन की डोلي उठने से पहले ही पूरे घर की अर्थी निकाल दी थी। ​मेरी आँखों से आंसुओं का समंदर फूट पड़ा। मैंने बाहर खड़े-खड़े आसमान की तरफ देखा और खुद को कोसा। मेरे पास खोने के लिए अब कुछ नहीं बचा था। मैंने दरवाज़े की कुंडी पर अपना काँपता हुआ हाथ रखा और खुद से कहा— "विदेश से खाली हाथ लौटा हूँ, पर झोली में सिर्फ असफलता नहीं, बल्कि अपनों के विश्वास का कत्ल करने का गुनाह लेकर आया हूँ।" ​मैंने दरवाज़ा धक्का देकर खोल दिया। सामने पापा की अंगारे जैसी आँखें थीं, माँ का बेजान चेहरा था, और अंजलि का सहमा हुआ वजूद था। अब मेरे पास सफाई देने के लिए कोई शब्द नहीं थे, बस सच का वो तूफान था जो सब कुछ जलाकर खाक करने वाला था।

    @memes

  • , "देखो, मेरे पास सोना है! मैं सबसे अमीर हूँ, इसलिए तुम सब मेरे दोस्त बनो।"

    @uuusedd

  • mummy papa, mai aagaya

    @tirth.pandya

Sunita Sharma

  • रात का वक्त था... रोहन अपने कंधे पर एक छोटा-सा बैग लटकाए अपने घर की गली में खड़ा था। कई साल बाद वह वापस आया था। उसने सोचा था कि घर की चौखट पर कदम रखते ही मां उसे गले लगा लेंगी... पापा उसके सिर पर हाथ रखेंगे... लेकिन जैसे ही वह दरवाजे के करीब पहुंचा, अंदर से पापा के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ बाहर तक आने लगी। “तुमने उसे विदेश भेजा ही क्यों था, सुनीता?” रोहन के कदम वहीं रुक गए। अंदर उसकी मां सुनीता की धीमी आवाज़ सुनाई दी— “मैंने क्या गलत किया जी? हमारा बेटा कुछ बनना चाहता था... मैंने तो बस उसका साथ दिया था।” पापा और गुस्से में चिल्लाए— “कुछ बना? क्या बना वो? आज देखो... विदेश से खाली हाथ वापस आ रहा है!” रोहन की आंखें झुक गईं। उसने दरवाजे पर हाथ रखा, लेकिन अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई। फिर पापा की आवाज़ आई— “तुमने अपने गहने बेच दिए थे ना उसे विदेश भेजने के लिए? क्या मिला तुम्हें? आज वही बेटा हमारे सामने हारकर वापस आ रहा है!” सुनीता कुछ पल चुप रहीं। फिर उनकी कांपती हुई आवाज़ आई— “मुझे अपने गहनों का अफसोस नहीं है... मुझे तो बस इस बात का डर है कि मेरा बेटा अंदर से कहीं टूट न गया हो।” ये सुनते ही रोहन की आंखों में आंसू आ गए। उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी मां ने उसे सिर्फ विदेश भेजने के लिए अपने गहने नहीं बेचे थे... उन्होंने अपने बेटे के सपनों के लिए अपनी खुशियां तक कुर्बान कर दी थीं। अंदर पापा फिर चिल्लाए— “अब क्या करेगा वो? नौकरी गई, पैसा गया... और हमारी उम्मीदें भी गईं!” रोहन ने आंसू पोंछे और धीरे से दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही सुनीता की नजर अपने बेटे पर पड़ी। वह कुछ सेकंड तक उसे देखती रह गईं। रोहन का चेहरा उतरा हुआ था... कपड़े धूल से भरे थे... और हाथ में सिर्फ एक छोटा-सा बैग था। सुनीता की आंखों से आंसू निकल पड़े। “रोहन...?” रोहन ने बस इतना कहा— “मां... मैं घर आ गया।” सुनीता दौड़कर उसके पास आईं और उसे सीने से लगा लिया। “मेरा बच्चा... तूने मुझे बताया क्यों नहीं कि तू इतनी परेशानी में है?” रोहन मां के कंधे पर सिर रखकर रो पड़ा। “मां... मैं हार गया।” सुनीता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा— “नहीं बेटा... तू हारकर नहीं आया।” रोहन ने आंसुओं के बीच मां की तरफ देखा। सुनीता ने उसके आंसू पोंछे और कहा— “तू मेरे पास वापस आया है... और मां के लिए इससे बड़ी जीत कोई नहीं होती।” कमरे में खड़े पापा यह सब देख रहे थे। उनके चेहरे पर गुस्सा अब धीरे-धीरे खामोशी में बदल चुका था।

    @mehndikhan12

  • घर के आँगन में टिमटिमाते हुए उस एक इकलौते पीले बल्ब की रोशनी में, मेरी आँखें पिछले तीन घंटों से दरवाजे की उस जंजीर पर टिकी थीं। वह जंजीर जब भी हवा के झोंके से थोड़ी सी भी हिलती, मेरे सीने की धड़कनें ऐसे बढ़ जातीं मानो मेरी साँसे थमने वाली हों। बाहर हो रही इस कड़ाके की ठंड और बर्फीली रातों से कहीं ज्यादा सर्द मेरे घर का माहौल था। मेरे हाथों की लकीरें घर का काम करते-करते घिस चुकी थीं, पर मेरी आँखों से सूख चुके आँसुओं की यह धारा रुकने का नाम नहीं ले रही थी। मेरे कानों में बार-बार वही पुरानी गूँज सुनाई दे रही थी—वह वक़्त जब मैंने अपने सुहाग की निशानी के तौर पर वो सोने के कंगन पहने थे, और वो माँ के दिए हुए थोड़े से गहने... जिन्हें मैंने एक-एक करके चुपचाप उस खझूर वाले सुनार के पास गिरवी रख दिया था। सिर्फ इस उम्मीद में कि मेरा बेटा रोहन लंदन की बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़कर एक दिन बड़ा अफसर बनेगा और हमारी सारी गरीबी, हमारे सारे दुख दूर कर देगा। ​हमारे मोहल्ले के लोग कहते थे, "सुनीता जी, अपने बेटे को बाहर भेज दीजिए, नसीब बदल जाएगा।" मैंने अपनी जिंदगी की इकलौती पूंजी और अपनी चूड़ियाँ तक दांव पर लगा दी थीं। जब भी रोहन का वीडियो कॉल आता और वह लंदन की बड़ी-बड़ी इमारतों के सामने खड़े होकर मुस्कुराता, तो मेरी छाती गर्व से फूल जाती थी। मैं पूरे मोहल्ले की औरतों को बुला-बुलाकर उसकी तस्वीरें दिखाती थी—देखो, मेरा लाल विदेशों में नाम कमा रहा है, बड़ी कंपनी में मैनेजर बन गया है। तब मुझे क्या पता था कि वह चमकती हुई दुनिया और वो तस्वीरें महज़ एक छलावा थीं, और मेरा बेटा उस विदेशी धरती पर एक-एक दाने के लिए मोहताज हो चुका था। मुझे क्या पता था कि जिस बेटे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए मैंने अपने सुहाग के गहने बेचे थे, वही बेटा एक दिन मेरे ही सीने पर इस बर्बादी का पहाड़ गिरा देगा। ​तभी, अचानक दरवाज़े पर एक धीमी सी खड़खड़ाहट हुई। मेरा दिल ज़ोर से उछलकर सीधे गले में आ गया। मैंने लड़खड़ाते और काँपते कदमों से दौड़कर दरवाज़ा खोला। सामने मेरा रोहन खड़ा था—वही बेटा, जिसके स्वागत के लिए मैंने बरसों से अपनी पलकें बिछा रखी थीं। पर उसके जिस्म पर लंदन वाला वह शान से खरीदा हुआ कोट नहीं था, बल्कि फटे-हाल कपड़े थे, चेहरे पर नाकामयाबी की धूल थी, और हाथ में एक मैला-कचैला सूटकेस था। उसकी खाली और डरी हुई आँखें चीख-चीख कर यह गवाही दे रही थीं कि वह कोई लाट साहब बनकर नहीं, बल्कि अपनी और हमारी बर्बादी की दास्तान लेकर इस घर की देहरी पर लौटा है। ​उसे इस हालत में देखकर मेरे मुँह से एक भयानक चीख निकल पड़ी। मैं उसे अपने सीने से लगाने के लिए आगे बढ़ी ही थी कि तभी अंदर वाले कमरे से मेरे पति—राजेश शर्मा की वह कड़क और गुस्से से दहाड़ती हुई आवाज़ गूँज उठी, जिसने पूरे घर की दीवारों को दहला दिया— "कहाँ है तेरा वो नालायक बेटा? कह दे उसे कि अगर इस घर की चौखट के अंदर कदम रखा, तो उसकी टाँगें तोड़ दूँगा! रिश्तेदारों से उधार माँग-माँग कर और बैंक का कर्ज़ चुकाने के लिए मैंने अपना इकलौता मकान तक दांव पर लगा दिया है! उस धोखेबाज ने हमारी सारी इज़्ज़त और खानदान की नाक इस समाज में कटवा दी है!" ​पति की वे कड़क बातें मेरे दिल पर किसी तेज़ खंजर की तरह उतर गईं। एक तरफ मेरा अपना खून—मेरा बेटा था, जो खाली हाथ और टूटा हुआ खड़ा था, और दूसरी तरफ वह पहाड़ जैसा कर्ज़, समाज के ताने और मेरी बेटी अंजलि का भविष्य था जिसकी शादी इसी लंदन की नौकरी के भरोसे तय हुई थी। मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। मुझे ऐसा लगा मानो धरती मेरे पैरों के नीचे से खिसक गई हो। मैंने रोहन की तरफ देखा और अपने काँपते हुए हाथों को अपने सीने पर रख लिया, जहाँ अब दिल की धड़कन की जगह केवल अंगारे सुलग रहे थे। ​मैंने अपने फटे हुए और रुंधे हुए गले से रोहन से कहा— "रोहन... मेरी आँखें देखकर सच बता दे कि यह कोई बुरा सपना है ना? मैंने अपने सुहाग की आखिरी निशानी, अपने जिस्म के वो गहने तक बिना एक पल सोचे बेंच दिए थे तुझे काबिल बनाने के लिए... क्या इसलिए कि तू एक दिन हमें इस कगार पर लाकर खड़ा कर दे? तूने सिर्फ अपनी डिग्री नहीं बेची बेटा, तूने तो इस 'माँ' का ईमान, उसका विश्वास और उसकी वर्षों की तपस्या को सरेआम नीलाम कर दिया है!" ​मेरे मुँह से निकला हर एक शब्द ज़हर में बुझा हुआ था। रोहन यह सब सुनते ही फफक-फफक कर रो पड़ा और सीधे मेरे पैरों में गिरकर सिसकियाँ लेने लगा। पर अब उसके रोने से, या उसके इन आँसुओं से क्या बदल जाता? मैंने अपनी ज़िंदगी की गाढ़ी कमाई और अपने ही हाथों से अपने सुहाग के घर की अर्थी सजा ली थी। ​बाहर आसमान में बारिश की बूँदें अब छप्पर से टपकने लगी थीं, और मेरे अंदर का तूफान आसमान के इस तूफान से भी कहीं ज्यादा भयानक था। मैंने रोहन को ज़मीन पर गिरा हुआ देखा और आसमान की तरफ देखते हुए अपनी टूटी हुई रूह से बस इतना ही कहा— ​"गहने बेचकर खरीदी थी जिस बेटे से उम्मीद की छांव, वही लौट के आया बनकर मेरे घर का काल और घाव... न बचा सुहाग की निशानी का साया, न बची इज्जत की आस, देख ले खुदा, आज एक माँ ने खुद अपने हाथों उजाड़ दिया अपना ही घर-आसपास।" ​उस रात उस घर में न कोई रोने वाला बचा था और न ही किसी के पास कोई और रास्ता था। रोहन के उन झूठे सपनों और फरेब ने हम सबको जिंदा जला दिया था, और मैं बस उस जलती हुई चिता के बीच सुलगती हुई एक बेबस माँ बनकर रह गई थी।

    @memes

Rajesh Sharma

  • घर के बाहर जल रहे उस बुझते हुए स्ट्रीट लैंप की पीली और धुंधली रोशनी में, मेरे हाथ की सुलगती हुई सिगरेट कब की बुझ चुकी थी, पर मेरे सीने में धधक रही आग और गुस्से की वह भयानक तपिश कम होने का नाम नहीं ले रही थी। पिछले तीन लंबे सालों से मैंने अपनी रीढ़ की हड्डी को इस समाज के सामने झुकाकर अपनी इज़्ज़त और खानदान की नाक बचाई थी। बैंक का वह भारी-भरकम कर्ज़, रिश्तेदारों से हाथ फैलाकर लिया गया एक-एक पाई का उधार, और सिर पर हर वक्त मंडराता इस बात का खौफ कि अगर इस मोहल्ले और समाज को यह बात पता चल गई कि जिस बेटे रोहन की 'लंदन की बड़ी नौकरी' और उसकी लग्जरी लाइफ की झूठी डींगें मैं पिछले कई सालों से इस चौपाल पर हाँकता फिर रहा था, वह असल में सरासर झूठ है... तो मेरी बरसों की कमाई हुई इज़्ज़त, मेरा मान-सम्मान एक ही पल में इस मिट्टी में मिल जाएगा। मेरे पैरों तले ज़मीन और मेरे सीने की धड़कनें तब पूरी तरह थम गईं, जब मैंने घर के अंदर यह भयंकर सच सुना कि मेरा वही बेटा—जिसके भविष्य को सुरक्षित करने, उसे दुनिया की सबसे बेहतरीन तालीम दिलाने के लिए मैंने अपना इकलौता मकान और अपनी इज़्ज़त तक दांव पर लगा दी थी, आज बिना किसी डिग्री के, जेब में फूटी कौड़ी न होने पर, पूरी तरह से खाली हाथ और चुपचाप इस घर की दहलीज़ पर लौट आया है। अंदर मेरी पत्नी सुनीता फफक-फफक कर इस तरह रो रही थी जैसे किसी की अर्थी उठ रही हो, और मेरी बेटी अंजलि का वो सहमा हुआ, मुरझाया हुआ चेहरा मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। जिस अंजलि की शादी मैंने इस समाज में सीना चौड़ा करके, रोहन की लंदन की कमाई के भरोसे तय की थी, उस रिश्ते के टूटने और बिखरने की कगार पर आकर मेरा पूरा वजूद गुस्से से काँप उठा। मुझसे एक पल भी बर्दाश्त नहीं हुआ और वो गुस्से का अथांग समंदर, जो पिछले तीन सालों से मेरे सीने के अंदर उबल रहा था, एक साथ बाहर फूट पड़ा। मैंने अपनी दहाड़ती और कड़कती हुई आवाज़ से पूरे घर की दीवारों को दहला दिया— "कहाँ छुपा बैठा है वो नालायक? बाहर निकाल उसे मेरे सामने! कह दे उससे कि आज इस घर में उस धोखेबाज, उस मक्कार के लिए कोई जगह नहीं है! बैंक वाले कल सुबह सबसे पहले हमारे घर पर कुर्की का नोटिस लेकर आने वाले हैं, और इन रिश्तेदारों के ताने मेरे कान के परदे फाड़ रहे हैं। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी अपनी इज़्ज़त और आबरू कमाने में झोंक दी, और उस औलाद ने एक ही झटके में मेरा पूरा नाम सरेआम इस बाजार में नीलाम कर दिया!" मेरी आवाज़ की गूँज इतनी तेज थी कि पूरा घर काँप उठा। तभी रोहन धीरे-धीरे, लड़खड़ाते हुए कदमों से उस कमरे के अंदर आया। उसके चेहरे पर न तो वो विदेश जाने का गुरूर था, और न ही कोई सफाई देने की हिम्मत; बल्कि उसकी गर्दन झुकी हुई थी और वह किसी मुज़रिम की तरह मेरे सामने खड़ा था। उसने मुझे देखते ही रोना चाहा, पर मेरा खून खौल उठा। मैंने आगे बढ़कर उसका कॉलर कसकर पकड़ा और उसे सीधे दीवार से लगाते हुए अपनी आँखों में अंगारे भरकर चीख कर कहा— "तू लंदन डिग्री हासिल करने गया था या हमारे इस हँसते-खेलते घर की अर्थी सजाने? एक बाप की सालभर की कमाई इज़्ज़त को बाजार में कौड़ियों के भाव बेचकर कौन सा तीर मार लिया तूने? आज अगर इस घर के दरवाजे तेरे लिए गलती से भी खुल गए, तो समझ ले कि हमने अपनी बची-कुची साँसें भी उस धोखेबाज को सौंप दीं!" मेरे मुँह से निकला हर एक शब्द किसी भारी पत्थर की तरह उस पर गिर रहा था। रोहन मेरे पैरों में गिरकर बुरी तरह सिसकियाँ लेने लगा, सुनीता कोने में बैठकर अपनी किस्मत को कोसने लगी, और अंजलि बदहवास होकर यह सब देख रही थी। उस पल मुझे यह कड़वा अहसास हुआ कि इंसान अपनी जिंदगी में चाहे जितनी मेहनत कर ले, चाहे जितने पापड़ बेल ले, अगर उसकी औलाद ही धोखा दे जाए तो उसके सारे अरमान और सपने धुआँ बनकर उड़ जाते हैं। मैंने रोहन की तरफ एक नफ़रत भरी नजर से देखा और अपनी भारी तथा रुंधे हुए गले से कहा— "कर्ज़ की लकीरों से लिखी थी जिस बेटे की तकदीर की छांव, वही निकला मेरे सीने पर लगाने वाला नासूर और घाव। इज्ज़त की बोली लगाकर जो लौटा है खाली हाथ घर, अब किस मुँह से दूँ जवाब इस ज़ालिम और खुदग़र्ज़ समाज पर?" उस रात उस घर में न तो कोई रोने वाला बचा था और न ही किसी के पास कोई और रास्ता था। रोहन के उन झूठे सपनों और फरेब ने हम सबको एक ही चिता पर जिंदा जला दिया था, और मैं बस उस आग के बीच खड़ा एक लाचार, बर्बाद और बेबस पिता बनकर रह गया था।

    @memes

  • (ek to karja uper se beti ki shaadi bhi karni h) agr ye ladka kamyaab ni hua kuch ni bna to humara baap bete ka rista khatam m use ghr m kadam tk ni rakhne dunga.

    @purnimaverma

Anjali

  • शाम का समय है। हल्की बारिश हो रही है। एक बंद पड़े रेलवे स्टेशन की बेंच पर माधव बैठा है। उसके पास एक फटी हुई पुरानी बोरी है, जिसमें सैकड़ों लिफाफे (Chittiyan) रखे हैं। कबीर हाथ में कैमरा लिए उसके पास आता है।) ​कबीर: (हैरानी से देखते हुए) बाबा... इस बंद स्टेशन पर बारिश में अकेले क्यों बैठे हो? और ये इतने सारे खत किस लिए हैं? ट्रेन तो यहाँ सालों से नहीं आती। ​(माधव बिना कबीर की तरफ देखे, मुस्कुराते हुए अपनी पुरानी ऐनक ठीक करता है।) ​माधव: (धीमी और शांत आवाज़ में) ट्रेन नहीं आती बेटा... लेकिन दर्द यहाँ रोज़ उतरता है

    @testigtestig

  • ज़रा सा भी नहीं पिघलता दिल तुम्हारा, इतना कीमती पत्थर कहा से ख़रीदा ...

    @mrrupeshkuma