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Vijendra Gupta@vijendra_vg12Aawaz
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V
Vipin singh@vipinsysingh
“अँधेरे से उजाले में निकल के देखो, ज़रा इस रौशनी से मिलो… तुम्हें मुझसे नहीं, खुद से प्यार हो जाएगा।” “तुम समझते क्यों नहीं? हर बार जब तुम हार मान लेते हो ना… अँधेरा जीत जाता है,” उसने धीमी आवाज़ में कहा। “और अगर मैं थक गया हूँ तो?” लड़के ने खिड़की के बाहर देखते हुए जवाब दिया, “हर तरफ बस नाकामियाँ हैं… कोई उम्मीद नहीं दिखती।” “उम्मीद दिखती नहीं… ढूँढनी पड़ती है,” वह मुस्कुराई, “तुमने कभी सुबह होने से पहले का आसमान देखा है?” “वो तो और भी ज़्यादा अँधेरा होता है…” “हाँ… लेकिन वही अँधेरा बताता है कि अब सूरज आने वाला है।” वह चुप हो गया। “तुम्हारी जिंदगी भी अभी उसी मोड़ पर है,” उसने उसकी तरफ बढ़ते हुए कहा, “तुम भाग रहे हो… खुद से, अपने सपनों से, अपनी रोशनी से।” “मेरे अंदर कोई रोशनी नहीं है,” उसकी आवाज़ भर्रा गई। “है… बहुत है। बस तुमने अपने डर की चादर ओढ़ रखी है।” “अगर मैं गिर गया तो?” “तो मैं उठाऊँगी।” “अगर फिर हार गया तो?” “तो हम फिर कोशिश
2/19/2026
9/2/2025

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