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avdhesh chauhan@avdhesh
दिन में तो सब उस रास्ते से जल्दी निकल जाते, लेकिन रात को कोई उधर झाँकता भी नहीं था।उस गाँव के पास एक पुराना, टूटा-फूटा हवेली जैसा मकान था, जिसे लोग "भूतों का घर" कहते थे।बहुत समय पहले की बात है। एक छोटा सा गाँव था, जो जंगल के किनारे बसा हुआ थादिन में तो सब उस रास्ते से जल्दी निकल जाते, लेकिन रात को कोई उधर झाँकता भी नहीं था।उस गाँव के पास एक पुराना, टूटा-फूटा हवेली जैसा मकान था, जिसे लोग "भूतों का घर" कहते थेबहुत समय पहले की बात है। एक छोटा सा गाँव था, जो जंगल के किनारे बसा हुआ था।
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