S
Sofiya..... princess@sd2979142Maestro
अपने ही दुःख को ढोते-ढोते,
किसी से ज्यादा लगाव कर बैठा…
भरोसा कांच की तरह था,
टूटा भी बिखर गया,
और वो शख्श बात-बात पर बदलता रहा, फिर मुकर भी गया…Related
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अपने ही दुःख को ढोते-ढोते,
किसी से ज्यादा लगाव कर बैठा…
भरोसा कांच की तरह था,
टूटा भी बिखर गया,
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